बिरसा मुंडा का संक्षिप्त इतिहास
झारखंड के महान नायक
प्राक्कथन
प्रिय पाठक
मित्रों मुझे विश्वास है कि यह बिरसा मुंडा का संक्षिप्त इतिहास आपके लिए
लाभदायक होगा, यह उन लोगों के लिए और भी महत्वपूर्ण है जो झारखंड राज्य के वासी हैं ।
बिरसा मुंडा झारखंड के महान नायक हैं उन्हें भगवान का दर्जा दिया जाता है। बिरसा
मुंडा का संक्षिप्त इतिहास से आपके ज्ञान में एक और सुंदर कड़ी जुड़ जाएगा।
मैंने इस पुस्तक
में जानकारी के तौर पर महाश्वेतादेवी द्वारा लिखित पुस्तक जंगल के दावेदार
को प्रमुख तौर पर इस्तेमाल किया है तथा अन्य विश्वासनिय ने स्रोतों का भी उपयोग
किया है।
पुस्तक के अंत
में बिरसा के जीवन से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं जो झारखंड प्रतियोगी
परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लोगों के लिए
उपयोगी है।
धनेश्वर
कुमार
बिरसा मुंडा महाविद्रोह उलगुलान के लिए जाने जाते हैं जिससे
अंग्रेज आतंकित हो गए थे । इसे दबाने के
लिए अंग्रेजों को कानून बनाना पड़ा था, उन्होंने
आदिवासियों के धर्म , जंगल और जमीन कि सुरक्षा के लिए अपने जीवन को समर्पित किया।
बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर
1875 को उलीहातू (अनुमंडल -खूंटी ,थाना- तामाड़ ) में हुआ, इनके पिता का नाम सुगना
मुंडा तथा माता कर्मी मुंडा थी । जिस दिन बिरसा का जन्म हुआ था वह दिन बृहस्पतिवार था इसलिए नाम पड़ा बिरसा। जन्म के
पश्चात सुगना मुंडा अपना नानी घर चलाकड़ चला गया, वहाँ जर्मन क्रिश्चयन
मिशन में शामिल हो गये। यहां सुगना मुंडा
का नाम पड़ा क्रिश्ताना सुगना मसीहा दास तथा बिरसा मुंडा का नाम पड़ा दाऊद
मुंडा (दाऊद बिरसा)। बिरसा के दो भाई थे
कोम्ता(गोद लिया) और कानू तथा दो बहने दासकीरा और चंपा। बिरसा मुंडा बचपन से ही प्रकृति प्रेमी रहे वे
टुइला बजाने में बहुत माहिर थे। टुइला एक वाद्य यंत्र है जो कद्दू के सूखे खोल से
बनाया जाता है । वे मुरली भी अच्छा बजाते थे । कहा जाता है कि जंगल में जब बिरसा
गाय बकरी चराने जाते थे तो अपने साथ बांसुरी और टुइला साथ लेकर जाते थे और जब
टुइला बजाते थे तो हिरण उसकी आवाज को
सुनने के लिए आ जाते थे एक बार तो वह अपने माता को टुइला का प्रभाव बताने के लिए
उसके सामने टुइला बजाकर चिड़िया को पकड़ लिया था।
बिरसा को बचपन से ही लगता था कि जंगल उसका है ,जो जानकारी
लोगों को जानने में कठिनाई होती थी वह जानकारी बिरसा को साधारण ही होता था उसे
मालूम था कि जंगल के किस हिस्से में कौन सा जानवर है, सूखी लकड़ी फल और औषधि कहां
मिलेंगे, झरना कहां है इसलिए जब बिरसा का एक बुजुर्ग मित्र धानी, जंगल मेरा
है कहकर चिड़ाता तो बिरसा भावुक और तेज
आवाज में कहता यह जंगल तुम्हारा नहीं मेरा
है। यहीं से बिरसा को अपने मातृभूमि और जंगल को बचाने के लिए संकल्प शुरू होने लगा
था।
जब वह कुछ बड़ा हुआ तो अपने चचेरा मामा निबाई मुंडा के साथ
नानी घर आयाभूत चला गया। बिरसा का नाना दिवाई मुंडा के दो पुत्र कर्मी के पिता
डिबर मुंडा तथा दूसरा निबाई मुंडा तथा
पुत्री कर्मी और जॉनी । बिरसा अपने
मौसी जॉनी के साथ रहने लगे तथा बिरसा का बड़ा भाई
कोम्ता को कुंडी बारतोली गाय चराने के लिए भेज दिया।
आयाभूत में ही
बिरसा मुंडा का प्रारंभिक शिक्षा प्रारंभ हुआ, वे जयपाल नाग के विद्यालय जाने लगे
इस तरह से जयपाल नाग ही बिरसा के प्रारंभिक शिक्षक बने। कुछ वर्षों बाद जॉनी का
शादी खटंगा में तय हुआ और शादी होने पर बिरसा अपने मौसी के साथ खटंगा चले गये।
बिरसा का मौसा भगत का काम करता था वह गुस्सैल प्रवृत्ति का
था। बिरसा खटंगा में अपनी मौसी के काम में सहायता करते थे तथा गाय, बकरी, भैंस को
चराने जाते थे। एक दिन बिरसा गाय
चराते-चराते सो जाते हैं ,जिससे गाय बकरी दूसरे लोगों का फसल खा जाता है और इस
कारण बिरसा को मौसा द्वारा डांट सुनना पड़ा। इसके बाद अगले सुबह अंधेरे में ही वह
अपने मौसी के घर छोड़ कर चला जाता है। परंतु वह मौसा के गुस्से के कारण नहीं निकला
था ,बल्कि वह इसे निकलने का एक मौका समझा क्योंकि उसके मन में आगे पढ़ने इच्छा थी जिससे वह अपने जमिन को वापस
पा सके व अपने धर्म और जंगल कि रक्षा कर
सके।
बिरसा सिधे कुंडी बारतोला चला जाता है ,जहां उसका भाई
कोम्ता, भूरा मुंडा के यहां गाय चराई का काम करता था । यहां से बिरसा बुर्ज मिशन
में शामिल हो जाता है और यहीं पढ़ाई लिखाई करता है यहां पर उन्होंने 2 वर्ष तक पढ़कर
लोअर प्रायमरी एजुकेशन परीक्षा पास कर ली इसके बाद बिरसा को वहां के शिक्षा
रेवरेंड ने आगे की पढ़ाई चाईबासा में करने की सलाह दिया।
सुगना बिरसा को आगे की पढ़ाई नहीं करने देना चाहता था
क्योंकि गरीबी बहुत थी। उसने बिरसा को समझाया कि तू पड़ेगा भी तो तुझे वे असभ्य और
लंगोटा पहनने वाला समझेंगे तो तुम्हें बहुत दुख होगा, मुझे क्या मैं तो गरीब और
भीखमांगा हुं परंतु बिरसा ने नहीं माना।
1886 ई० मे बिरसा, सुगना और तीन लड़के अभिराम, बांबा और
इसाक चाईबासा चले गए परंतु मिशन में केवल बिरसा को लिया गया बाकी लोग वापस गांव
चले गए। बिरसा चाइबासा में 1886-90 तक
रहे ।
यहां बिरसा की दोस्ती अमूल्य से होती है वह एक बंगाली लड़का
था जो मुंडा भाषा भी जानता था। अमूल्य बिरसा को वहां के नियमों को बताया और पढ़ने
लिखने में बहुत मदद करता था।
सरदारी लड़ाई
को मूलकी लड़ाई भी कहते हैं इस लड़ाई का नेतृत्व कोल सरदारों ने किया जो कोल
विद्रोह के समय अपनी मातृभूमि की जमीन छोड़कर असम के चाय बागान में काम करने
के लिए भाग गए थे। इस बीच उसकी उनकी जमीन दूसरे लोगों ने हथिया ली थी कुछ
वर्षों बाद में लौट कर वापस आए तो जमीन के नए मालिकों ने उन्हें जमीन लौटाने
से इनकार कर दिया अपनी जमीन की प्राप्ति के लिए आदिवासियों ने लगभग 40 बरस की
लंबी लड़ाई लड़ी इस लड़ाई में उराँव और मुंडा भी शामिल थे। सरदारी लड़ाई
(1858-95)
चाईबासा मिशन में भी लड़कों ने जमीन वापस पाने में मिशन से
सहायता मांगी लेकिन सहायता नहीं मिलने पर बहुत सारे लड़के निकल कर अपने अपने गांव
चले गए। बिरसा भी लंबी छुट्टी पर अपना घर चले गये। सरदारों और मुंडाओं को पकड़कर
मुकदमा चलाया जा रहा था, सरदारों की ओर से बैरिस्टर कुछ नहीं कर रहा था जबकि
मुंडाओं की ओर से कोलकाता के बैरिस्टर जैकब लड़ रहे थे।
धानी बिरसा को जन्म से ही
पहचान लिया था और उसे लगता था कि बिरसा ही मुंडा लोगों के लिए भगवान है। धानी
बिरसा को मिशन छोड़ने के लिए उकसाता है परंतु बिरसा पुनः छुट्टी के बाद मिशन लौट
जाता है।
मिशन में किसी भी मुंडा
लड़कों को समझ नहीं आ रहा था कि उन्हें क्या करना है, वे लोग बिरसा पर विश्वास
करते थे। एक दिन सारे मुंडा लड़के बिरसा को घेरकर बैठ गए और पूछने लगे हमें क्या करना चाहिए। बिरसा का जवाब था कि उन्हें वहीं रह कर पढ़ना चाहिए,
इसी से भला होगा । बिरसा को अभी भी क्रिस्तान में विश्वास था। लड़कों ने अमूल्य से
बिरसा की दोस्ती तोड़ने के लिए कहा क्योंकि वह बड़ा होकर एक दिन दीकू बनेगा जिस पर
बिरसा भड़क गया।
फादर नॉटरेट को विश्वास
होने लगा था कि मुंडा हाथ से निकलते जा रहे हैं उसने सभी मुंडा से कहा कि तुम लोग किंग्डम
आफ हेवन में विश्वास मत खोना।
साल 1887-88 के बीच
सरदारों और मिशन के बीच लड़ाई हो गई तब फादर नोटरेट ने बोला कि सरदार लोग धोखेबाज
और ठग होते हैं फादर के इस बात से बिरसा को बहुत आहत पहुंचा क्योंकि बिरसा को
सिखाया गया था कि हमें सभी में विश्वास करना चाहिए जबकि इसे स्वयं फादर द्वारा
तोड़ा जा रहा था। फादर नोटरेट ने एक दिन बिरसा को अपने पास बुला कर उससे सवाल जवाब
करने लगे जहां दोनों के बीच बतंगड़ हो जाता है ।
बिरसा चाईबासा छोड़कर चलाकॾ
चला गया। धानी एक दिन बिरसा से मिलने आता है बिरसा धानी को बताता है कि मन बहुत स्थिर रहता है बहुत
सारा प्रश्न उठता है कि वह कहां से आया है, कैसे आया है धानी ने बिरसा को सिंगला
दा की आग की कहानी सुनाता है ।
एक समय दुनिया में मुंडा
भर जाते हैं उन्हें खाने के लिए नहीं मिलने लगता है, जंगल में जानवर भर जाते हैं
उन्हें भी खाने के लिए नहीं मिलने लगता है तब सिंगबोंगा आग का वर्षा करते हैं तब
सब जलकर नष्ट हो जाता है पर एक मुंडा आदमी और मुंडा औरत केकड़ा के गड्ढे में छुप जाते हैं वहां शीतल जल
होता है जब आग बुझ जाता है तो उन्हीं से सारे
मुंडा जन्म लेते हैं हम उन्ही के संतान हैं ।
परंतु बिरसा इस कहानी को
पहले भी सुन चुका था अभी भी उसका मन इसमें नहीं मान रहा था।
बिरसा 1991 में आनंद
पांडे जो बनगांव के जमींदार जगमोहन सिंह का मुंशी था के पास चला जाता है आनंद
पांडे एक वैष्णो धर्मावलंबी थे । वहां बिरसा
तीन वर्ष (1994 तक) रहे। बिरसा ने जेनउ
धारण किया चंदन लगाकर रामायण पाठ किया और वैष्णो
धर्म को जाना फिर भी उसका मन स्थिर नहीं हुआ जब आनंद पांडे ने उसे कृष्ण को
मानने और माला जपने के लिए कहा तो बिरसा ने मना कर दिया और जवाब दिया कि हरम
हमारे आदि पुरुष हैं हम सिंगबोंगा के प्रजा हैं।
बिरसा पुनः चलाकड़ आ जाता
है बिरसा की मां कर्मी उससे नाराज थी सुगना का हालत इतना खराब हो गया कि वह भूखे
रहने के लिए मजबूर हो चुका था। बिरसा ने देखा
कि उसके गांव में एक आदमी का मृत्यु हुआ है जिसमें उसके सोना और कुछ कौड़ी
को साथ में दफनाया गया था, उसने रात में श्मशान जाकर मुर्दा खोद निकाला और उसके
सोना और कौड़ी निकालकर बाजार में बेचकर चावल दाल नमक और अपने मां के लिए कपड़े
लाया, परंतु बिरसा के इन घटनाओं को कोम्ता का साला देख लिया था उसने सारी बातें
गांव में फैला दी इससे बिरसा का गांव में रहना आफत हो गया। कर्मी और सुगना भी
बिरसा के इस दुर्दांत से बहुत आहत हुए।
बिरसा गांव को छोड़ दिया
तथा जंगल में रहने लगा, सभी लोग बिरसा को
पागल समझने लगे एक दिन बिरसा अचानक गांव आया उसके चेहरे में आत्मविश्वास भरा हुआ
था शरीर काला और आंखों में चमक था। सब उसकी ओर देख रहे थे बिरसा ने आवाहन किया कि
वह भगवान है, सिंगबोंगा ने उसे धरती का आबा घोषित किया है, लोगों ने उसके भाव
भंगिमा देखकर विश्वास कर लिया कि बिरसा मुंडाओं का भगवान है। दूर-दूर से लोग बिरसा
का दर्शन करने चल कर आने लगे सरदार लोग भी
बिरसा का प्रचार करने लगे क्योंकि मुंडाओं का इकट्ठा होना सरदारों के लिए फायदेमंद
था।
बिरसा ने मुंडाओं को
बताया कि अनेक देवी देवताओं के स्थान पर सिर्फ सिंगबोंगा की उपासना करो। उपासना
करने के लिए मंदिर का आवश्यकता नहीं, सरना उपयुक्त स्थल है, हिंसा का परित्याग करो
एवं मद्यपान निषेध है। उसने जनेऊ धारण करने को भी् कहा ।
बिरसा के अनुयायियों ने इसे बिरसाइत धर्म के रूप में
स्वीकार किया । यह क्रिश्चयान और वैष्णव धर्म के विचारों का मिश्रण था।
बिरसा को अभी तक यह पता नहीं था कि उस पर कार्रवाई के लिए अंग्रेज रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं, परंतु उसे यह
समझ में आ गया कि केवल सरदारों से बैठक एवं मुंडाओं को धर्म की बात करते रहने से
कुछ नहीं होगा । बिरसा इसके बाद से सरदारों से बैठना छोड़ देता है , मुंडाओं को कह
देता है कि कुचला तीर तैयार करो हमें अब लड़ना है। इसके बाद से गांव में चुपके
चुपके तीर बांटने लगता है । धानी कुचला बनाने में माहिर था, इसलिए वह कुचला तैयार
करने लगा । 22 अगस्त 1995 के दिन बिरसा सो रहा था, तभी अंग्रेजों ने पूरे गांव को
घेर कर सोते हुए बिरसा को पकड़ लिया। उसे पकड़ने के लिए डिप्टी सुपरिटेंडेंट और
साथ में गांव के जमींदार जगमोहन सिंह था।
बिरसा को जेल ले जाया गया, बिरसा जेल जाने वक़्त मुंडाओं को
कह रखा की चिंता नहीं करना वह दोबारा आएगा।
लेफ्टिनेंट गवर्नर चाहता था कि मुंडा लोगों को बिरसा के
प्रति अविश्वास और संदेह पैदा हो, इसके लिए वह बिरसा को पागल घोषित करने के लिए
डॉक्टर रोजर्स को उसका पागलपन जा़ंच करने और पागलपन का रिपोर्ट बनाने के लिए कहा,
परंतु डॉक्टर ने जांच में पाया कि बिरसा पागल नहीं है वह सामान्य है इसलिए वह
पागलपन का सर्टिफिकेट नहीं बनाया । जब लेफ्टिनेंट को पता चला कि उसका पागलपन का
सर्टिफिकेट नहीं बना तो वह डॉक्टर के पास जाकर कहा कि तुमने इसे पागल क्यों घोषित
नहीं किया, डॉक्टर ने जवाब दिया कि वह ऐसा नहीं कर सकता है क्योकी बिरसा पागल नहीं
है ।
लेफ्टिनेंट ने बिरसा से स्वयं बात करने के लिए अपने
कर्मचारियो में मुंडारी जानने वाला व्यक्ति का तलाश करने लगा। उसे एक बंगाली
डॉक्टर मिला जो मुंडारी जानता था उसका नाम था अमूल्य बाबू । यह वही अमूल्य बाबू था
जो चाईबासा का मिशन में बिरसा का मित्र था। जब लेफ्टिनेंट अमूल्य बाबू को बुलाता
है और बिरसा से यह पूछने के लिए कहता है कि वह मुंडा लोगों को क्यों भड़का रहा है
अमूल्य का पूछने से पहले ही बिरसा जवाब दे देता है लेफ्टिनेंट आश्चर्य में पड़
जाता है क्योंकि उसे पता नहीं था कि बिरसा अंग्रेजी भी बोल सकता है।
बिरसा के कारण जमींदार और अंग्रेज दोनों परेशान हो गए थे ,क्योंकि
मुंडा लोग खेती-बाड़ी करना छोड़ दिया था,
जिससे वे लगान भी नहीं भरते थे ना ही कुछ खरीदते थे ना ही उधार लेते थे । वे लोग घाटो
बिना नमक के साथ खाते और कभी-कभी उपवास भी रह जाते थे।
जब लेफ्टिनेंट सवाल जवाब करके चला जाता है अमुल्य कुछ देर
चुप्पी साधे रहता है परंतु धीरे-धीरे उनके बीच मनमुटाव दूर होती है और बातचीत शुरू
करते हैं बिरसा अमूल्य से कहता है कि वह
उसे बाहर की जानकारी उसके पास लाकर दे ,अमूल्य ने इसे यह कहते हुए स्वीकार कर लेता
है कि इसमें उसकी नौकरी भी जा सकती है।
19 नवंबर 1995 को बिरसा का मुकदमा होने वाला था । उसके
पिछले रात को अंग्रेज कर्नल ने देखा कि मशाल जलाकर के ढेर सारे लोग आ रहे हैं उसने दरोगा से उसके
बारे में पूछा उसने बताया कि वह मुंडा लोग हैं । कर्नल को आश्चर्य हुआ क्योंकि
उसने केवल गांव के मुखिया को ही बुलवाया था उसने दरोगा से पूछा कि यह बात इतने
लोगों तक कैसे पहुंचा, गांव में तो टेलीग्राफ भी नहीं लगा है, दरोगा ने बताया कि मुंडा लोग इकट्ठा होने
के लिए पहाड़ पर आग जलाकर संकेत देते हैं।
सवेरे तक ढेर सारे मुंडा मुकदमा स्थल पर बिरसा का दर्शन
करने के लिए इंतजार कर रहे थे परंतु उन लोगों को बिरसा से मिलने नहीं दिया गया।
बिरसा पर मुकदमा चलाया गया तथा उसे 2 वर्ष का सजा दी गयी
तथा बाकी लोगों को ₹20 का जुर्माना या 3 महीने का जेल हुआ।
30 नवंबर 1897 को बिरसा मुंडा रिहा हुआ तथा पुरानी हरकत
नहीं करने की बात कही।
बिरसा ने आंदोलन जारी रखने के लिए दो गुट बनाये एक गुट
धार्मिक प्रचार के लिए तथा दूसरा लड़ाई करने के लिए। गया मुंडा को सेनापति चुना
गया, सोमा मुंडा को धार्मिक मामले का प्रमुख तथा डोनका मुंडा को राजनीतिक मामले का
प्रमुख चुना गया। पांडू मुंडा ,जोहन
मुंडा, रीढ़ा मुंडा, दुखन स्वामी, हाथीराम मुंडा ,डेमकी मुंडा व ठिपरू मुंडा को
आंदोलन के मुख्य लोगों में शामिल किया गया। बृहस्पतिवार और इतवार को रात में
अलग-अलग जगह में सभा का आयोजन किया जाता था।
बिरसा ने इस लड़ाई का एक नाम दिया ‘उलगुलान'। मुंडा आंदोलन का यह मूल मंत्र
बना।
पहला सभा का आयोजन डोंबारी (पश्चिमी सिंहभूम) में हुआ जहां
उसने अपने अधिकारों को पाने का दो रास्ता बताया, एक शांति का रास्ता तथा दूसरा लड़ाई का रास्ता। शांति का रास्ता में कानून से लड़ना था जबकी
लड़ाई का रास्ता युद्ध का रास्ता था। सब ने दूसरे रास्ता को चुना। इसी तरह जितने
भी जगह सभा हुआ बिरसा ने सबसे सहमति मांगी।
बिरसा ने सबको आत्मविश्वास दिलाया तथा मुंडा के गौरव को
वापस लौटाने की बात कही जिससे वह खुद पर गर्व कर सके। उसने सभी जगह उलगुलान का मंत्र दिया
24 दिसंबर 1899 के क्रिसमस की संध्या को यूरोपियन क्लब में
डिप्टी कमिश्नर और अन्य लोग पार्टी में थे तब बिरसा एवं उनके दलों ने सभी ओर अचानक
तीर चलाने शुरू कर दिए।
तमाड़, उलीहातू तथा तोरपा के गिरजाघर में तीर छोड़े गये, खूंटी
के बहुत से गांव में आग लगा दी गई मुरहू का एंग्लिकन चर्च में तीर छोड़ा
गया, सराडा मिशन के गोदाम में आग लगाया, सिंहभूम के कुरंगूटू
में जर्मन चर्च को आग लगा कर राख कर दिया गया, लागरा में एक कॉन्स्टेबल, चक्रधरपुर के जर्मन चर्च का
चौकीदार तथा सोनपुर में एक जर्मन व्यवसाई मारा गया तथा इसमें कई घायल हुए।
सुबह हुआ और बिरसा को अंग्रेजों ने ढूंढना शुरू किया परंतु
वे लोग गायब थे। कहां जा कर छुपे पता नहीं
चला। इस
आक्रमण में मुंडाओं का उद्देश्य किसी को मारना नहीं था बल्कि यह विद्रोह का शुरुआत
संकेत था।
अंग्रेजों ने बिरसाइतों की खोज-बिन जोर-शोर से शुरू कर दिया, अंग्रेजों ने डोरंडा से 150 सैनिक के साथ
खूंटी में बिरसा का तलाश करने लगे। 12 जनवरी 1900 को सैलराकर पहाड़ (डोंबारी बुरु)
में सारे मुंडा को पुलिस द्वारा घेर लिया गया जहां पर बहुत सारे मुंडा शहीद हो गए।(इस सहादत कि याद में डोंमबारी
बुरू में प्रत्येक साल 12 जनवरी को मेला का आयोजन किया जाता है)यहाँ बिरसा पकड़ में नहीं आया, बिरसा के गिरफ्तारी
के लिए ₹500 का इनाम घोषित किया जाता है
तथा डोन्का मुंडा एवं अन्य के लिए एक ₹100 इनाम की राशि का घोषणा किया जाता है।
इस दौरान मुंडा लोगों का सब कुछ छीन लिया जाने लगा चाबुक से
पीटा जाने लगा। उधर बिरसा डोन्का , सुनरा और परमी जंगल में छिप- फिर रहे थे। सुनरा बहुत ज्यादा घायल हो चुका
था इसलिए डोन्का और मंझिया उसे तिलडूबा के जंगल में छोड़ कर चले जाते हैं और अपने
आप को पकड़वा देते हैं तथा वे दोनों शशि भूषण राय के साथ मिलकर बिरसा का पता बता
देते हैं उस समय बिरसा जमकोई के जंगल में
छिपा था। उधर बिरसा ने परमी को भी मना किया था कि भात पकाने के लिए लकड़ी मत जलाना
लेकिन उसमें माना जिससे धुआं उठा और उनका पता चल गया। डोन्का को बिरसा का पता
बताने के लिए बार्तो़दि के मानि मु़डा ने मजबूर किया था क्योंकि ऐसा नहीं करता तो मानी स्वयं ही उसे पकड़वा
देता, ऐसा करने से डॉनका
को भी ₹20 प्राप्त होता है।
इस तरह से शशि भूषण और मंजिया ने पैसे के लालच में उन सभी
मुंडाओं को पकड़वा दिया जिनके लिए इनाम घोषित किया गया था।
बिरसा के हाथों में हथकड़ियां लगाया गया और सिपाही उन्हे रांची जेल ले जाने लगे। सब मुंडा इकट्ठा थे बिरसा को
देखकर वे सभी रो रहे थे लेकिन बिरसा में किसी तरह का भय नहीं था वह सिर ऊंचा करके
चला जा रहा था।
बिरसा को रांची के जेल में डाल दिया गया। जेल में पहले से
कैद धानी चाहता था कि बिरसा उसके कक्ष में कैद हो परंतु ऐसा नहीं हुआ। 20 मिनट के
लिए बिरसा को भरमी के कक्षा में रखा जाता है भरमी रोने लगती है, बिरसा बोलता है
रोना बंद करो और सुनो समय बहुत कम है जब मजिस्ट्रेट के पास जाना हुआ तो सभी मुंडा इकट्ठे
जाना और बोल देना कि बिरसा को हम नहीं पहचानते उलगुलान हमने नहीं उसने किया और तुम
लोग मुझे ठग और धोखेबाज बताना इससे तुम
सारे मुंडा बच जाओगे । बिरसा को हाथों में हथकड़ी कमर और पैर में मोटा सीकड़ बांध
दिया गया और एक बंद कमरे में कैद कर दिया गया।
बैरिस्टर जैकब मुंडा की तरफ से बहुत कोशिश कर रहा था कि
मुकदमा हो परंतु ऐसा होने नहीं दिया जा रहा था जैकब कह रहा था कि कैदी को जनवरी से
अप्रैल तक बिना मुकदमा के जेल में रखा गया है और अभी तक मुकदमा तैयार नहीं हुआ है
यह मुंडा लोगों पर अंग्रेजों का बहुत बड़ा अत्याचार है।
अमूल्य बिरसा के कक्ष में जाता है और उसे कहता है कि बिरसा
तुम तो मुझसे बात नहीं करोगे इस पर बिरसा कहता है कि तुम दिकु नहीं हो तुम मुंडा
लोगों के बारे में अच्छा सोचते हो, परंतु तुम से बात करने पर तुम फस जाते और मैं यह नहीं चाहता था।
बिरसा कक्ष
में पैर में लगे सिकुड़ी को पैरों से
घसीटते हुए इधर-उधर चलता था तो आवाज निकलता था इसी आवाज को सुनकर सारे मुंडा को
पता होता कि बिरसा जिंदा है और उन्हें संतोष होता, परंतु 9 जून 1900 को वह आवाज बंद हो जाता है सारे मुंडा रोने लगे।
सुपरिटेंडेंट बिरसा के कक्ष में देखा कि बिरसा बेहोश पड़ा है, अमूल्य बाबू भी वहां
पहुंचा। सुपरिटेंडेंट ने हैजा का कारण बताते हुए मृत घोषित कर देता है।
हालांकि बिरसा के मौत का कारण क्या था यह सही से पता नहीं
चला। उस समय ना पोस्टमार्टम हुआ ना कोई जांच हुआ और मामला को दबा दिया गया।
परंतु मुंडाओं को विश्वास हो गया था कि बिरसा मरा नहीं वह
अभी भी उलगुलान के रूप में जिंदा है और वह हमेशा जिंदा रहेगा।
सुगना मुंडा- बिरसा के पिता
कर्मी मुंडा- बिरसा
की माता
दाऊद मुंडा- बिरसा के बचपन का नाम
कोमता मुंडा- बिरसा का बड़ा भाई
आनंद पांडे- बिरसा के धार्मिक गुरु
धानी मुंडा- बिरसा
के गांव का बुजुर्ग
कानू- पलुस - सुगना
का दादा
छोटू और नागु – बिरसा
के पुरखा
कानू - बिरसा
का छोटा भाई
निवाई मुंडा - बिरसा का मामा
दिवाई मुंडा - बिरसा का नाना
जोनी - बिरसा
की मौसी
जयपाल नाग- बिरसा
की आरंभिक शिक्षक
अमूल्य- बिरसा
का सहपाठी और मित्र
जान हाफ मैन- इनसाइक्लोपीडिया
मुंडारी का के लेखक
गया मुंडा- मुंडा
उलगुलान का प्रशिक्षक और सेनापति
परमी- कोमता की पत्नी
डोन्का मुंडा - राजनीतिक
मामले का प्रमुख
सोमा मुंडा- धार्मिक मामले का प्रमुख
जैकब- मुंडओं का वकिल
egRoiw.kZ iz’u
1.
बिरसा का जन्म कब हुआ था ?
2.
बिरसा मुंडा का जन्म झारखंड के किस गांव में हुआ था?
3.
बिरसा मुंडा के पिता का क्या नाम था?
4.
बिरसा मुंडा के माता का नाम क्या था?
5.
बिरसा मुंडा का जन्म किस दिन हुआ था?
6.
क्रिश्चियन मिशन में शामिल होने के बाद बिरसा मुंडा का नाम
बचपन में क्या पड़ा ?
7.
बिरसा कौन सा वाद्य यंत्र बजाते था?
8.
दिवाई मुंडा कौन था?
9.
बिरसा का प्रारंभिक शिक्षा कहां पर हुआ?
10.बिरसा के प्रारंभिक शिक्षक कौन थे?
11.बिरसा खटंगा में किसके घर में रहता था?
12.बिरसा मुंडा कहां रह कर अपना प्राइमरी
एजुकेशन परीक्षा पास किया?
13.प्राइमरी एजुकेशन के बाद आगे पढ़ने के
लिए बिरसा कहां चला गया?
14.1886 ई में चाईबासा के मिशन में बिरसा
का दोस्ती किससे होता है?
15.मुंडा के तरफ से कौन से बैरिस्टर केस लड़
रहे थे?
16.सरदारी लड़ाई कब हुई?
17.किस लड़ाई को मूलकी लड़ाई कहा जाता है?
18.सिंगबोंगा क्या है?
19.1991 में बिरसा अध्यात्मिक
ज्ञान लेने के लिए किसके पास चले जाते है?
20.बिरसा आनंद पांडे के पास कितने समय तक
रहे?
21.कहां पर बिरसा ने स्वयं को भगवान घोषित
किया?
22.बिरसा के अनुयाई क्या कहलाए?
23.बिरसा पहली बार अंग्रेजों के पकड़ में कब
आये?
24.बिरसा मुंडा के पहली गिरफ्तारी में कितने
वर्ष का सजा हुआ था?
25.बिरसा ने मुद्राओं की लड़ाई को क्या नाम
दिया?
26.बिरसा मुंडा द्वारा पहला सभा कहां आयोजित
किया गया?
27.इनसाइक्लोपीडिया मुंडारीका पुस्तक के
लेखक कौन थे?
28.उलगुलान के लिए सेनापति किसे चुना गया?
29.बिरसा मुंडा ने उलगुलान के राजनीतिक
मामले के लिए किसे चुना?
30.उलगुलान के धार्मिक मामले के नेता के तौर
पर किसे चुना गया?
31.झारखंड क्षेत्र से प्रकाशित होने वाली
प्रथम पत्रिका क्या थी?
32.अंग्रेजों ने बिरसाइतो को कहां पर चारों
तरफ से घेर लिया?
33.बिरसा अंग्रेजों से बचने के लिए किस जंगल
में छिपे फिर रहे थे?
34.बिरसा को किस जेल में कैद किया गया?
35.बिरसा मुंडा का मृत्यु कब हुआ?
Comments
Post a Comment